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दिन-रात गधे की तरह मेहनत करने के बाद भी क्यों औसत रह जाते हैं लोग? चाणक्य नीति से जानें खुद को चमकाने का सीक्रेट!
दिव्य न्यूज़ संडे डेस्क :-आपके आसपास हर दिन एक अजीब सी त्रासदी घट रही है. यह उस शांत व्यक्ति की तरह है, जो ऑफिस में नए लोगों को ट्रेन करता है, लेकिन कभी प्रमोशन नहीं पाता. यह उस लड़की की तरह है जो हमेशा कहती है कोई बात नहीं, जबकि साफ दिखता है कि सब ठीक नहीं है. यह उस कमरे में अदृश्य होने जैसा है, जिसमें आप सालों की मेहनत के बाद अपनी जगह बनाते हैं. ये अच्छे लोग हैं. ईमानदार लोग. जिनके पास शिष्टाचार, नैतिकता और सही-गलत की समझ है. फिर भी ये अक्सर फंसे रह जाते हैं.
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अनदेखे. कम वेतन वाले. परेशान. क्यों? क्योंकि अच्छाई, जब बुद्धि के साथ नहीं होती, तो असली दुनिया में कमजोरी बन जाती है. आचार्य चाणक्य अपनी नीति में कहते हैं कि हम में से ज्यादातर को शालीनता की शिक्षा मिली है. माता-पिता बचपन से कहते हैं कि अच्छे बनो… अपनी बारी का इंतजार करो… जवाब मत दो… एडजस्ट करो. यह स्कूल, परिवार या छोटे ग्रूप में काम करता है. लेकिन असली दुनिया में नियम अलग हैं. लोग इसलिए नहीं जीतते क्योंकि वे सही हैं. वे इसलिए जीतते हैं क्योंकि वे जागरूक हैं. ताकत की, लोगों की, राजनीति की, समय की समझ रखते हैं. यहीं चाणक्य आते हैं..
. तलवार के साथ नहीं बल्कि रणनीति के साथ. वे अच्छाई के खिलाफ नहीं थे. वे अंधी अच्छाई के खिलाफ थे. उन्होंने सिखाया कि बुद्धि के बिना दया आत्म-बलिदान है, पुण्य नहीं. चाणक्य नीति में कहते हैं कि आप सोच सकते हैं कि मैं हमेशा दूसरों की मदद करता हूं. मैं जरूरत से ज्यादा करता हूं. मुझ पर भरोसा किया जा सकता है. यह सराहनीय है लेकिन सच्चाई यह है कि लोग आपको मेहनत के लिए नहीं, असर के लिए इनाम देते हैं. और असर पैदा करने के लिए, आपको सिर्फ ईमानदारी नहीं बल्कि प्रभाव भी चाहिए. आपको दिखना चाहिए. सीमाएं तय करनी चाहिए. चाणक्य ने साफ कहा कि रणनीति के बिना आदमी मंदिर की तरह है, जिसमें दीपक नहीं है. दिखता तो दिव्य है लेकिन रोशनी नहीं देता. चाणक्य कहते हैं कि कई अच्छे लोग सोचते हैं कि बोलना अहंकार है. अपनी कीमत मांगना घमंड है. इसलिए वे अपनी आवाज, उम्मीदें और आखिरकार… आत्म-सम्मान कम कर लेते हैं
. लेकिन समझदार विनम्रता ऐसी होती है कि मैं चिल्लाऊंगा नहीं लेकिन झुकूंगा भी नहीं. मैं भीख नहीं मांगूंगा, लेकिन खुद को धोखा भी नहीं दूंगा. चाणक्य अपमानित होने पर चुप नहीं रहते थे. वे सम्राटों के गलत व्यवहार पर सिर नहीं हिलाते थे. वे चुप्पी तब रखते थे जब फायदा होता था और शब्दों का इस्तेमाल तब करते थे जब पहाड़ हिलाने की जरूरत होती थी चाणक्य आगे कहते हैं कि चाहें कितनी भी समस्या क्यों ना हो आप उसी नौकरी में रहते हैं. उसी दोस्ती में और उसी माहौल में भी क्योंकि इन सभी को छोड़ना गलत लगता है. अनग्रेटफुल या रिस्की भरा. लेकिन असली परीक्षा यह है कि अगर आप सिर्फ डर के कारण कहीं टिके हैं तो यह वफादारी नहीं, डर है. और चाणक्य की नीति इसमें कठोर है. वह कहते हैं किउस पेड़ को छोड़ दो जो अब छाया नहीं देता. लगाव को उद्देश्य मत समझो. अर्थात अगर कोई चीज धीरे-धीरे आपको कमजोर कर रही है, तो वहां टिके रहना पुण्य नहीं, सबसे बड़ी गलती है. चाणक्य नीति के अंत में कहते हैं कि असल सबक क्या है? अच्छा होना बंद मत करो.
लेकिन ऐसे अच्छे मत बनो कि दुनिया आपको रौंद दे. आपके मूल्य आपकी ताकत हैं. लेकिन आपकी रणनीति आपकी तलवार है. और बुद्धि, जो चुप्पी, समय और काम में दिखती है, दोनों के बीच पुल है. आप औसत रहने के लिए पैदा नहीं हुए. आप दुनिया के लिए उपयोगी बनने के लिए पैदा हुए हैं, बिना खुद इस्तेमाल हुए. यही चाणक्य चाहते थे कि आप अपने नैतिकता को ना छोड़ें बल्कि सीखें कि कब और कैसे उनका इस्तेमाल करें, बिना खुद को खोए.