संतोष यादव की कहानी फर्श से अर्श तक पहुंचने की है। उन्होंने वह मुकाम हासिल कर लिया है जो लोगों का सपना होता है। मुंबई की झुग्गी बस्ती से निकलकर संतोष ने ग्लोबल टेक्नोलॉजी सेक्टर में अपनी अलग पहचान बना ली है। वह अब जर्मनी में कोडरैबिट में प्रिंसिपल डेवलपर एडवोकेट के रूप में काम करते हैं। कभी उन्होंने मजबूरी में 5,000 रुपये की नौकरी तक की। उनकी जिंदगी में आए बदलाव को उन दो तस्वीरों में देखा जा सकता है जो हाल में उन्होंने शेयर की थीं। इसमें वह अपनी पत्नी के साथ हैं।संतोष यादव की कहानी फर्श से अर्श तक पहुंचने की है। उन्होंने वह मुकाम हासिल कर लिया है जो लोगों का सपना होता है। मुंबई की झुग्गी बस्ती से निकलकर संतोष ने ग्लोबल टेक्नोलॉजी सेक्टर में अपनी अलग पहचान बना ली है। वह अब जर्मनी में कोडरैबिट में प्रिंसिपल डेवलपर एडवोकेट के रूप में काम करते हैं। कभी उन्होंने मजबूरी में 5,000 रुपये की नौकरी तक की। उनकी जिंदगी में आए बदलाव को उन दो तस्वीरों में देखा जा सकता है जो हाल में उन्होंने शेयर की थीं। इसमें वह अपनी पत्नी के साथ हैं।संतोष यादव ने लगभग तीन दशक मुंबई की झुग्गी बस्ती में रहकर बिताए। गरीबी और संघर्षों से उबरकर खुद की ग्लोबल टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में पहचान बनाई। हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर उन्होंने अपनी कहानी दुनिया के साथ शेयर की।
इस पोस्ट में 2012 और 2026 की उनकी और उनकी पत्नी की दो तस्वीरें हैं। इसके जरिये उन्होंने जिंदगी में आई चुनौतियों के बारे में सिलसिलेवार तरीके से बताया।
झुग्गी बस्ती में रहते थे
संतोष यादव ने बताया कि मुंबई में वह झुग्गी बस्ती में रहा करते थे। बचपन में उन्हें क्रिकेट का शौक था। लेकिन, स्कूल में उन्हें संघर्ष करना पड़ा। 10वीं की परीक्षा में उनका प्रदर्शन बहुत खराब था। साइंस प्रोग्राम में एडमिशन न मिलने पर उनके पिता के एक दोस्त ने उनका मार्गदर्शन किया। उन्हीं की सलाह पर अमल करते हुए संतोष ने कंप्यूटर साइंस डिप्लोमा कोर्स में दाखिला लिया।
यह बदलाव कठिन था। अंग्रेजी उनकी पहली भाषा नहीं थी। उन्हें आज तक क्लास में अपना रोना भी याद है। वह दोबारा असफल होने से डरते थे।
पिता की नौकरी जाने के बाद बढ़ी मुश्किल
संतोष ने तभी तय किया कि कुछ भी हो, वह अपना पूरा फोकस पढ़ाई पर करेंगे। वह मानते हैं कि अगर आप कुछ हासिल करने का फैसला लेते हैं तो आप उसे हासिल कर सकते हैं और करेंगे। कभी हार न मानें।
उनके कॉलेज के सालों के दौरान एक और चुनौती तब सामने आई जब उनके पिता ने अपनी नौकरी खो दी। इससे संतोष की कंप्यूटर साइंस की डिग्री के लिए सालाना फीस निकालना मुश्किल हो गया। यादव को याद है कि वह कैसे पूरी रात रोते रहे और सो नहीं सके।
दिल में लग गई मां की बात
लेकिन, इस मुश्किल समय में उनकी मां चट्टान बन गईं। उनके सहयोग से संतोष को अपनी शिक्षा जारी रखने में मदद मिली।
संतोष ने बताया, ‘मेरी मां ने मुझे रोते हुए देख लिया था। अगले दिन उन्होंने मेरे पिताजी से बात की। उन्होंने कहा- तुम्हें जो करना है करो, लेकिन मेरा बेटा अपनी पढ़ाई जारी रखेगा।’
यह बात संतोष के भी दिल में लग गई। उन्हें घर वालों के संघर्षों का और ज्यादा एहसास हुआ।
5000 रुपये की नौकरी भी की
2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के दौरान स्नातक होने के बाद संतोष यादव को काम खोजने के लिए संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने 5,000 रुपये महीने वेतन वाली नौकरी स्वीकार की। समय के साथ उन्होंने स्किल्स डेवलप कीं। ओपन-सोर्स प्रोजेक्ट्स में कॉन्ट्रिब्यूट किया। तकनीकी समुदाय में पहचान हासिल की।
आज, वह अपने करियर में 17 साल से अधिक समय बिता चुके है। संतोष यादव एक गूगल डेवलपर एक्सपर्ट हैं। वह भारत के पहले GitHub स्टार हैं। साथ ही इंटरनेशनल स्पीकर भी हैं। उनकी कहानी दृढ़ता, दृढ़ संकल्प और परिवार के समर्थन के प्रभाव का शक्तिशाली उदाहरण है।
