कोरबा: शहर में बहने वाली हसदेव नदी के तट पर अतिक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है। स्थिति यह है कि नदी किनारे की जमीन पूरी तरह भर चुकी है और अब लोग सीधे नदी के रेतीले हिस्सों में खंभे गाड़कर मकान बनाने लगे हैं। मानसून में जान जोखिम की आशंका बढ़ गई है। गेरवाघाट, तुलसीनगर, सीतामढ़ी और पंपहाउस क्षेत्र तक फैले नदी तट पर छह हजार से अधिक अवैध आवास खड़े हो चुके हैं, जबकि हर वर्ष करीब 600 नए मकान बनाए जा रहे हैं। नदी किनारे कब्जा कर मकानों का निर्माण कर उन्हें किराए पर देने और खरीद-बिक्री का बड़ा कारोबार फल फूल रहा है। प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं होने से यह अवैध बसाहट लगातार फैल रही है और अब जल बहाव वाले खतरनाक क्षेत्रों तक पहुंच चुकी है। शहर में सस्ती जमीन और आवास की कमी का फायदा उठाकर भू-माफिया नदी तटों पर कब्जा कर रहे हैं। दिहाड़ी मजदूरी के लिए गांवों और अन्य राज्यों से आने वाले श्रमिकों को कम किराए पर यहां रहने की सुविधा दी जा रही है।
कोरबा में हसदेव नदी पर भू-माफिया का कब्जा, रेतीले हिस्से में खंभे गाड़कर खड़े किए 6,000 अवैध मकान
औद्योगिक नगरी कोरबा में हसदेव नदी के अस्तित्व पर भारी संकट मंडरा रहा है। भू-माफिया और लेबर सप्लायरों की साठगांठ से गेरवाघाट से लेकर सीतामढ़ी तक नदी के …और पढ़ें
तुलसी नगर के पास हसदेव नदी के नीचे हिस्से में तैयार हो चुके मकान
HighLights
किराया और खरीद-फरोख्त बना आय का जरिया
गेरवाघाट, पंपहाउस और सीतामढ़ी में भू माफिया सक्रिय
तुलसी नगर के पास हसदेव नदी के नीचे हिस्से में तैयार हो चुके मकान
नईदुनिया प्रतिनिधि, कोरबा: शहर में बहने वाली हसदेव नदी के तट पर अतिक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है। स्थिति यह है कि नदी किनारे की जमीन पूरी तरह भर चुकी है और अब लोग सीधे नदी के रेतीले हिस्सों में खंभे गाड़कर मकान बनाने लगे हैं। मानसून में जान जोखिम की आशंका बढ़ गई है। गेरवाघाट, तुलसीनगर, सीतामढ़ी और पंपहाउस क्षेत्र तक फैले नदी तट पर छह हजार से अधिक अवैध आवास खड़े हो चुके हैं, जबकि हर वर्ष करीब 600 नए मकान बनाए जा रहे हैं।
नदी किनारे कब्जा कर मकानों का निर्माण कर उन्हें किराए पर देने और खरीद-बिक्री का बड़ा कारोबार फल फूल रहा है। प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं होने से यह अवैध बसाहट लगातार फैल रही है और अब जल बहाव वाले खतरनाक क्षेत्रों तक पहुंच चुकी है। शहर में सस्ती जमीन और आवास की कमी का फायदा उठाकर भू-माफिया नदी तटों पर कब्जा कर रहे हैं। दिहाड़ी मजदूरी के लिए गांवों और अन्य राज्यों से आने वाले श्रमिकों को कम किराए पर यहां रहने की सुविधा दी जा रही है।
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गेरवाघाट से तुलसीनगर होते हुए सीतामढ़ी तक नदी तट पर बड़ी संख्या में कच्चे और पक्के मकान बनाए जा चुके हैं। अब लोग तट से नीचे उतरकर सीधे नदी क्षेत्र में निर्माण कर रहे हैं। सीतामढ़ी और तुलसीनगर के आसपास 70 से 80 हजार रुपये में मलबे सहित मकान उपलब्ध कराए जा रहे हैं। मानसून के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने पर इन बस्तियों में रहने वाले हजारों लोगों की जान खतरे में पड़ जाती है। विशेषकर बांगो बांध के गेट खोले जाने की स्थिति में नदी का बहाव तेज हो जाता है और पानी बस्तियों में घुस जाता है।हर वर्ष बाढ़ के दौरान सीतामढ़ी और गेरवाघाट के लोगों को सामुदायिक भवनों में शरण लेनी पड़ती है।
अप्रैल से जून के बीच तेजी से मकान निर्माण होता है ताकि बारिश से पहले बसाहट तैयार हो सके। वर्षा के दिनों में अधिकांश घरों में पानी भर जाता है। मूलभूत सुविधाओं के अभाव में यहां रहने वाले लोगों का जीवन बेहद कठिन बना हुआ है। नदी तट होने के कारण बिजली, सड़क और पेयजल जैसी सुविधाएं व्यवस्थित रूप से उपलब्ध कराना भी संभव नहीं हो पा रहा। विडंबना यह है कि अवैध बसाहट वाले क्षेत्रों में सामुदायिक भवन, बिजली के खंभे और सड़क जैसी सुविधाएं भी विकसित कर दी गई हैं। इससे अतिक्रमण को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा मिलने की बात सामने आ रही है।
गोदाम और खटाल के लिए भी हो रहा उपयोग
नदी तटों का उपयोग केवल आवास तक सीमित नहीं है। यहां व्यवसायिक गोदाम, खटाल और पैरा-भूसी भंडारण के लिए भी बड़े पैमाने पर कब्जे किए जा रहे हैं। यही कारण है कि नदी किनारे जमीन पर कब्जे को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है।बारिश के दौरान कच्चे मकानों के ढहने का खतरा बना रहता है। इससे बचने के लिए अब लोग खंभों पर टिके पक्के मकान तैयार कर रहे हैं। बावजूद इसके तेज बारिश और बाढ़ के समय हजारों लोग जोखिम के बीच जीवन बिताने को मजबूर हैं।
लेबर सप्लायर बढ़ा रहे अवैध बसाहट
शहर में अवैध बसाहट बढ़ने के पीछे लेबर सप्लायरों की भी बड़ी भूमिका बताई जा रही है। औद्योगिक प्रतिष्ठानों में सस्ते श्रमिक उपलब्ध कराने के लिए ठेकेदार ग्रामीण क्षेत्रों से लोगों को कोरबा लाते हैं और उन्हें सुविधाविहीन इलाकों में बसाते हैं। नदी तटों के अलावा टावर लाइन और श्मशान घाट जैसे स्थान भी अब अतिक्रमण से सुरक्षित नहीं रह गए हैं। रोजगार और आवास का झांसा देकर लोगों को जोखिम वाले क्षेत्रों में बसाया जा रहा है।
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