पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर हो चुका है. तृणमूल कांग्रेस के 15 साल पुराने शासन का अंत हो गया है और ममता बनर्जी न केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवा चुकी हैं, बल्कि अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से चुनाव भी हार चुकी हैं. अब वे न तो सूबे की मुखिया हैं और न ही विधानसभा की सदस्य. बावजूद इसके, सरकारी नियमों और सुरक्षा प्रोटोकॉल के चलते उन्हें कई ऐसी सुविधाएं मिलती रहेंगी जो एक आम नागरिक को मयस्सर नहीं होतीं. भारतीय संविधान और राज्य के नियमों के दायरे में ममता बनर्जी को पूर्व मुख्यमंत्री के तहत क्या सुविधाएं मिलेंगी
संविधान और राज्यों के विशेषाधिकार
भारत के संविधान का अनुच्छेद 164(5) राज्यों को यह अधिकार देता है कि वे अपने मंत्रियों और विधायकों के वेतन, भत्ते और सुविधाओं का निर्धारण खुद करें. पश्चिम बंगाल में यह व्यवस्था ‘द वेस्ट बंगाल सैलरीज एंड अलाउंस एक्ट’ और ‘द वेस्ट बंगाल लेजिस्लेटर (मेंबर्स पेंशन) एक्ट’ के जरिए संचालित होती है. ममता बनर्जी चूंकि लंबे समय तक विधायक और मुख्यमंत्री रही हैं, इसलिए पद पर न रहने के बावजूद विधानसभा सचिवालय के नियमों के तहत वे पेंशन और अन्य सुविधाओं की हकदार बनी रहेंगी.
वेतन और पेंशन
पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री का वेतन लगभग 2 लाख 10 हजार रुपये और विधायकों का वेतन 1 लाख 21 हजार रुपये प्रति माह के करीब होता है. पद से हटने के बाद ममता बनर्जी एक पूर्व विधायक के तौर पर पेंशन की हकदार हैं. राज्य के नियमों के अनुसार, एक पूर्व विधायक को न्यूनतम 31 हजार रुपये प्रति माह पेंशन मिलती है. यदि कोई सदस्य 5 साल से अधिक समय तक सदन में रहा है, तो उसे हर अतिरिक्त साल के लिए 2500 रुपये की अतिरिक्त राशि दी जाती है. ममता बनर्जी के लंबे कार्यकाल को देखते हुए उनकी पेंशन राशि अच्छी-खासी होगी, हालांकि यह उनकी इच्छा पर निर्भर करेगा कि वे इसे स्वीकार करती हैं या नहीं.

