कद्दू वर्गीय फसलों में सुबह की सिंचाई पड़ सकती है भारी, बीमारियों और झड़ते फलों से बचने के लिए बदलें तरीका
दिव्य न्यूज़ 18:-गर्मियों में कद्दू, लौकी और तरोई जैसी फसलों की सिंचाई को लेकर किसान अक्सर एक बड़ी गलती कर बैठते हैं. अधिकतर किसान सुबह के समय पानी देना बेहतर समझते हैं, लेकिन कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार यही सुबह की सिंचाई फसल की बर्बादी का कारण बन रही है.
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सुबह पानी देने से खेतों में पैदा होने वाली उमस पाउडरी मिल्ड्यू और डाउनी मिल्ड्यू जैसी घातक बीमारियों को दावत देती है. इसके अलावा, यह परागण की प्रक्रिया में बाधा डालकर फलों के झड़ने की समस्या को भी बढ़ा देती है. आइए जानते हैं सिंचाई के समय का वह गणित, जो आपकी फसल को बीमारियों से बचाकर बंपर पैदावार दे सकता है.जब आप सुबह सिंचाई करते हैं, तो मिट्टी में भरपूर नमी हो जाती है. जैसे ही दोपहर की तेज धूप पड़ती है, वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है
जिससे पौधों के चारों ओर एक ‘ह्यूमिड माइक्रो-क्लाइमेट’ बन जाता है. यह अत्यधिक नमी और गर्मी का मेल फफूंद के पनपने के लिए सबसे अनुकूल स्थिति है. यही कारण है कि सुबह पानी देने वाले खेतों में बीमारियों का प्रकोप अन्य खेतों की तुलना में कहीं अधिक देखा जा रहा है.कद्दू वर्गीय फसलों में पाउडरी मिल्ड्यू एक गंभीर समस्या है. इसमें पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसा जमाव होने लगता है
, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है. सुबह की नमी और दोपहर की उमस इस बीमारी के बीजाणुओं को तेजी से फैलने में मदद करती है. अगर समय रहते सिंचाई का प्रबंधन नहीं बदला गया, तो यह बीमारी पूरी फसल को कुछ ही दिनों में सुखाकर नष्ट कर सकती है.डाउनी मिल्ड्यू नमी वाले वातावरण में पनपने वाला दूसरा खतरनाक रोग है. यह पत्तियों के निचले हिस्से पर पीले और कोणीय धब्बे बनाता है. सुबह की सिंचाई से पत्तियां लंबे समय तक गीली रहती हैं, जो इस फंगस को तेजी से बढ़ाता है.
एक्सपर्ट का मानना है कि जो किसान शाम के समय सिंचाई करते हैं, उनके खेतों में इस रोग का असर सुबह सिंचाई करने वालों के मुकाबले काफी कम पाया गया है.कृषि विशेषज्ञ डॉ. हादी हुसैन खान ने बताया कि कद्दू वर्गीय फसलों के अच्छे उत्पादन के लिए कीटों द्वारा परागण जरूरी है. सुबह के समय ही मधुमक्खियां और अन्य परागणकर्ता सबसे अधिक सक्रिय होते हैं. इस समय सिंचाई करने से फूलों के भीतर पानी भर सकता है या नमी के कारण परागकण भारी होकर चिपक सकते हैं. इससे कीटों को पराग इकट्ठा करने में मुश्किल होती है, जिससे निषेचन की प्रक्रिया अधूरी रह जाती है और फल गिरने लगते हैं.गलत समय पर सिंचाई करने से पौधों की जड़ों पर दबाव बढ़ता है. दोपहर की गर्मी और मिट्टी की नमी का असंतुलन ‘फिजियोलॉजिकल स्ट्रेस’ पैदा करता है. इससे छोटे फल पकने से पहले ही पीले होकर गिरने लगते हैं. कई बार फलों का आकार भी टेढ़ा-मेढ़ा हो जाता है. किसान अक्सर इसे पोषक तत्वों की कमी समझते हैं, जबकि असली समस्या सिंचाई के समय और उससे उत्पन्न होने वाली अत्यधिक उमस में छिपी होती है.सुबह की सिंचाई के बाद जब दोपहर में सूरज सिर पर होता है, तो मिट्टी के भीतर का तापमान अचानक बदलता है. गर्म हवा और गीली मिट्टी का संपर्क जड़ों को ‘शॉक’ दे सकता है. कद्दू वर्गीय फसलों की जड़ें काफी संवेदनशील होती हैं. तापमान के इस उतार-चढ़ाव से जड़ों की अवशोषण क्षमता कम हो जाती है, जिससे पौधा पोषक तत्व सही ढंग से नहीं ले पाता और उसकी विकास दर धीमी पड़ जाती है.अत्यधिक नमी केवल बीमारियों को ही नहीं, बल्कि हानिकारक कीटों को भी आकर्षित करती है. सफेद मक्खी और एफिड्स जैसे रस चूसक कीट आर्द्र वातावरण में तेजी से प्रजनन करते हैं. ये कीट न केवल पौधों का रस पीते हैं, बल्कि कई तरह के वायरल रोगों के वाहक भी बनते हैं. सुबह की सिंचाई से पैदा हुई ‘ह्यूमिडिटी’ इन कीटों के लिए एक सुरक्षित कवच का काम करती है, जिससे कीटनाशकों का असर भी कम हो जाता है.कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि कद्दू वर्गीय फसलों में सिंचाई का सबसे उपयुक्त समय सूर्यास्त से ठीक पहले या शाम का है. शाम को पानी देने से मिट्टी रात भर ठंडी रहती है और नमी का स्तर स्थिर रहता है. इससे सुबह तक पानी जड़ों में गहराई तक समा जाता है और दिन की धूप में पत्तियां सूखी रहती हैं. यह बदलाव न केवल बीमारियों को कम करता है, बल्कि फसल की गुणवत्ता और पैदावार में भी इजाफा होता है.