दिव्या न्यूज़ 18:- खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स के पहले दिन छत्तीसगढ़ ने दो मेडल अपने नाम किए थे | इनमें से एक सिल्वर वा दूसरा ब्रांज था | सिल्वर 100 मीटर ब्रेस्ट स्टोक में अनुष्का भगत ने जीता| वही ब्रांज सैम इवेंट, मेल कैटेगरी में निखिल ने दिलाया| इन दो के अलावा छत्तीसगढ़ से स्विमिंग ( फीमेल कैटिगरी) मैं एक और प्रतिभागी थी | इवेंट था 200 मीटर फ्री स्टाइल और एथलीट की सपना कोर्सा | सपना मेडल तो नहीं दिला पाई | इसके बावजूद सबसे ज्यादा चर्चा उनकी हुई| जब उन्होंने फिनिश किया, तों दर्शक दीर्घा में बैठे हर शख्स ने खड़े होकर तालिया के साथ उनका सम्मान किया| सपना महज 12 साल की है | खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स मैं सबसे कम उम्र की तेराक है | बीजापुर में रहती है 1 साल पहले ही स्विमिंग शुरू की और इस बार अपना पहला नेशनल खेला | पिता किसान है | उनके इलाके में शहर जैसी सुविधा नहीं है| जिस पुल में सपना प्रैक्टिस करती है उसका आकार नेशनल इंटरनेशनल कंपटीशन स्टैंडर्ड के स्विमिंग पूल से आधा है | डाइट की भी समस्या रहती है| ढाई मिनट पीछे होने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी ; सबसे पहले यह बताते हैं कि सपना के लिए तालियां क्यों बजाई गई | दरअसल इवेंट में सपना ने स्टार्ट तो अच्छा किया | लेकिन फिर बिछड़ गई | उनके साथ वाले सभी एथलीट ने 2 मिनट 39 सेकंड से 2 मिनट 58 सेकंड के बीच अपना इवेंट पूरा कर लिया | लेकिन सपना की टाइमिंग थी 4 मिनट 27 सेकंड | अपने कॉम्पीटर्स मुकाबले डेढ़ से ढाई मिनट पीछे| यानी इन डेढ़ से ढाई के बीच सपना अकेली थी | 
जो 50 मीटर के पल में स्विमिंग कर रही थी | इन विच के मिनट्स में दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों के बीच यह चर्चा भी शुरू हो गई थी कि सपना गिव अप कर देगी | यानी फिनिशिंग करने से पहले ही मुकाबला छोड़ देगी | लेकिन सपना ने ऐसा नहीं किया| लोग एक टक गैलरी में बैठे यही देख रहे थे | की क्या सपना फिनिश कर पाएगी | लेकिन जब उन्होंने फिनिश किया, तो दर्शक दीर्घा में बैठे हर शख्स ने खड़े होकर तालिया के साथ उनका सम्मान किया | सपना महज 12 साल की है और खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में सबसे छोटी उम्र की तैराक है |
सपना ने बताया कि जिस पुल में ट्रेनिंग करती है वह 25 मी ही लंबा है| नेशनल और इंटरनेशनल कंपटीशन में जहां खेले जाते हैं वह 50 मीटर लंबा होता है| आसान भाषा में समझा जाए तो 25 मीटर के स्विमिंग पूल में और इंटरनेशनल स्विमिंग पूल में तैरने के एक्सपीरियंस मैं उतना ही अंतर है| सपना के पिता किसान है | फाइनेंशियल मजबूती इतनी नहीं कि बाहर जाकर ट्रेनिंग ले पाए | पढ़ाई और ट्रेनिंग दोनों साथ में मैनेज करना भी मुश्किल होता है| पिछले साल समर क्लास के दौरान सपना पहली बार पल में उतरी | यह खेल उनको रास आया पिता से कहा कि वह स्विमिंग में अपना कैरियर बनाना चाहती है| फैमिली ने सपोर्ट किया| और खेलो इंडिया ट्रााइबल गेम्स मैं एक साल बाद ही उन्हें नेशनल खेलने का मौका दिया|
[ कोच बोली बच्चों में प्रतिभा बहुत, अगली बार मेडल जीतेंगे :- सपना की कोच दीप्ति वर्मा बताती है कि सपना का पहला नेशनल है| एक्सपीरियंस के लिहाज से कंसीडर्ड करने को कहा है | हमारी कोशिश है कि वह डिमोटिवेट ना हो | मेडल जीतने के लिए अभी जो इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए वह हमारे पास नहीं है| लोकल एडमिनिस्ट्रेशन प्रयास कर रहा है| लेकिन बहुत सुधार की उम्मीद बची हुई है| डाइट में हमें पोहा केला मिलता है | जरूरत चिकन की है| अभी हमारे पास कोई एकेडमी भी नहीं है| जहां बच्चे रहकर तैयारी कर सकें | उम्मीद है कि ट्राइबल गेम्स के बाद खेल इंफ्रास्ट्रक्चर में और बेहतरीन हो | साथ ही खिलाड़ियों को भी मिलने वाली सुविधाएं बढ़े |

