दिव्या न्यूज़ 18 :- रायपुर की अवधिया पारा की घुमावदार सड़क और तंग गलियों में एक पुराना थका हुआ सा मकान खड़ा है| इसी मकान में रहते थे| लगभग 84 साल के जागेश्वर प्रसाद अवधिया | इस मकान की जर्जर दीवारों पर ना कोई नेम प्लेट है| ना ही किसी जीत की चमक| मगर यह दीवारें बोल पाती तो बता पाती की कैसे एक आदमी ने 39 साल तक इंसाफ का दरवाजा खटखटाया | और जब वह दरवाजा खुला जब तक जिंदगी की ज्यादातर खिड़कियां बंद हो चुकी थी| अभिभाजित मध्य प्रदेश के स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन में क्लर्क के पद पर काम करने वाले जागेश्वर प्रसाद अवधिया को 1986 में ₹100 की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था|
अब लगभग 39 साल बाद अदालत उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया है | व्यवस्था की बेरुखी, न्याय में देरी, और एक इंसान की टूटी उम्मीद के प्रतीक बन चुके जागेश्वर प्रसाद अवधिया कहते हैं इस फैसले का कोई मतलब नहीं है| नौकरी गई समाज ने मुंह मोड़ लिया. बच्चों को लिखा पढ़ा नहीं पाया. शादी नहीं करवा पाया.| रिश्तेदारों ने भी दूरी बना ली | इलाज के अभाव में मेरी पत्नी की मौत हो गई| इन बीते हुए समय को कोई लौटा पा सकता है क्या | वह बहुत दुख और पीड़ा के साथ कहते है| की हाई कोर्ट ने मुझे बेगुनाह कहा है| पर अदालत से मिले इस प्रमाण पत्र का वजन उस भारी बोझ के सामने बहुत कम है | जो मैंने पूरे परिवार के साथ 39 साल तक ढोया है |
जागेश्वर प्रसाद अवधिया कहते हैं कि जिस दिन उन्हें गिरफ्तार किया गया था| वह दिन उनके लिए नहीं पूरे परिवार के लिए एक सजा की शुरुआत था| जागेश्वर प्रसाद अवधिया बात करते-करते चुप हो जाते हैं | और रोने लगते हैं | जैसे बरसों के दुख से उबरने की कोशिश कर रहे हो | वह पुरानी फाइल के पन्ने दिखाते हैं| पुराना पीला पड़ा हुआ पन्ना हर एक तारीख की तरह थका नजर आ रहा है| जिसमें 39 साल की कहानी दर्द है | दिव्य न्यूज़ 18 संतोष सिंह

